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मिट्टी का घर
मैंने मिट्टी का एक घर बनाया, उसमें अपने सारे सपने सजाए। बारिश आई तो दीवारें बह गईं, तब समझा—सपने छत से नहीं, हौसलों से बचाए जाते हैं।
— Ketan · Shayarana with Ketan
© Shayarana with Ketan
19 October 2026
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मेरे अल्फ़ाज़
मैंने काग़ज़ पर अपने एहसास रख दिए, कुछ अधूरे ख़्वाब, कुछ विश्वास रख दिए। लोग पढ़ेंगे तो शायद मुझे जान जाएँ, मैंने हर शायरी में अपने कुछ राज़ रख दिए।
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शहर
शहर में मकान बहुत हैं, मगर किसी के पास ठहरने की जगह कम है। लोग रास्ते तो बता देते हैं, मंज़िल तक साथ चलने वाले कम हैं।
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पिता की कमीज़
पिता की पुरानी कमीज़ में, अब भी मेहनत की गंध आती है। वो कमीज़ छोटी पड़ गई मुझको, मगर उनकी कुर्बानी
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