Hindi Kavita
एक दिन अपने लिए
एक दिन मैं भी सुबह उठूँगा, बिना किसी डर के साँस भरूँगा। न कोई मुझसे हिसाब माँगेगा, न मैं ख़ुद से कोई सवाल करूँगा। कुछ पुराने ख़त खोलूँगा, कुछ भूले चेहरे याद करूँगा। जिन सपनों को वक़्त नहीं दे पाया, उनके पास कुछ देर बैठा करूँगा। फिर खिड़की से आती धूप में, अपने चेहरे को पहचानूँगा। बहुत दिनों तक सबका बनकर रहा, एक दिन ख़ुद का भी हो जाऊँगा।
— शायराना विद केतन
© Shayarana with Ketan
20 October 2026
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