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ज़िंदगी की शायरी

ज़िंदगी की शायरी

कामयाबी की क़ीमत

मैं अपने ख़्वाब की क़ीमत चुकाता जा रहा हूँ, घर से दूर, ख़ुद से दूर होता जा रहा हूँ। जिन्हें ख़ुश देखने के लिए निकला था घर से, उन्हीं के साथ बैठने का वक़्त गँवाता जा रहा हूँ। अगर मंज़िल पर पहुँचकर वो साथ ही न हों, तो किसके लिए मैं इतना आगे जा रहा हूँ?

— Ketan · Shayarana with Ketan

© Shayarana with Ketan

19 October 2026

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